Thursday, April 14, 2011

मेरी हालत कुछ ऐसी है
मछली जल बिन जैसी है
आँखें हैं पर नींद कहाँ ?
सुर-ताल हैं पर संगीत कहाँ ?

वो रेंत का आशियाना !

वो मेरा बचपन, वो मेरा बांकपन,
वो दादी की कहानियों की राजा-रानी,
वो बेफिक्री, वो मासूमियत,
वो माँ की गोद और बाबा के कंधे

वो आमियाँ के बगीचे, वो पडोसी के बैर
बहनों से लड़ाई, वो इमली की खटाई
वो घोड़ों पे चढ़ाना, भेंसों को नहलाना
वो ऊँचे शिक पे रखे पेड़ों को चुरा के खाना

वो दिन भर की शरारतें, और जोरों का रोना
माटी मैं लोटना, फिर माँ का आँचल से आंसू पोछना
वो दोड़ते हुए गिरना, पीर उठकर फिर दोड़ना
वो बार-बार मक्खन के मटके फोड़ना

वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी
वो प्लास्टिक की गुडिया, वो मिट्टी के खिलोने
कैसें भूलाएँ वो लम्हें इस दिल से,
कैसे करें हम फिर वही कामना
वो रेंत का आशियाँ, वो कबड्डी का गाना
कसम खुदा की, क्या था वो जमाना !