
मैंने पहली बार... कुछ इस तरह कि चीज लिखने कि कोशिश कि है... जिसे हम प्राथर्ना कहतें हैं !!
उम्मीद है ... आपको पसंद आये . . .
उम्मीद है ... आपको पसंद आये . . .
!!! प्राथर्ना !!!
कि कर सकूं हर मुश्किल आसं माँ
हर भवंर से नैया लाऊं, निकाल
कभी न छोडूँ, जीने कि आस माँ
तू स्नेह दे माँ
कि दुश्मनों से भी कर सकूं प्यार माँ
नफरतों के बीच भी प्रेम का दीप जले
कभी न हो ईर्ष्या और द्वेष का
भाव माँ. . . . . . .
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. . . . . . . रणधीर चौधरी . . .
इसके आगे भी लिखूंगा... परन्तु, पहले आप सब कि राय जाना चाह रहा था ... कि प्राथर्ना जैसी हुई भी है या नहीं ?