Friday, May 27, 2011


मैंने पहली बार... कुछ इस तरह कि चीज लिखने कि कोशिश कि है... जिसे हम प्राथर्ना कहतें हैं !!
उम्मीद है ... आपको पसंद आये . . .


!!! प्राथर्ना !!!


तू बल दे माँ

कि कर सकूं हर मुश्किल आसं माँ

हर भवंर से नैया लाऊं, निकाल

कभी न छोडूँ, जीने कि आस माँ



तू स्नेह दे माँ

कि दुश्मनों से भी कर सकूं प्यार माँ

नफरतों के बीच भी प्रेम का दीप जले

कभी न हो ईर्ष्या और द्वेष का
भाव माँ

. . . . . . .
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. . . . . . .

. . . . . . . रणधीर चौधरी . . .

इसके आगे भी लिखूंगा... परन्तु, पहले आप सब कि राय जाना चाह रहा था ... कि प्राथर्ना जैसी हुई भी है या नहीं ?