ये मेरे मन के उद्गार हैं... शायद ये पागलपन लगे... और सच कहें तो हमारा मन तो पागल ही है... ये तो पता नहीं कोई और शक्ति है... जो हमने अपने मन पे काबू पाने में सहायक सिद्ध होती है... पर शायद में उतना खुश नसीब नहीं... ख़ैर जाने दें... पर ये पंक्तियाँ आपतक मेरी बात पहुचाने में सक्षम हुई तो मुझे... संतोष का अनुभव होगा... पर जैसा भी हो आप के टिप्पिनियों का इंतज़ार रहेगा...
शीर्षक : जीवन क्या है ?
कभी बंधुओं के संग हँसें तो
कभी उनके काँधें पे सर रख रोये होंगें
कभी दिन के चकाचोंध उजाले में भी
रास्ता दिखाने वाले कई होंगें तो
कभी अमावास कि घनघोर अंधेरों में भी
अपनी परछाईयां तक साथ छोर गयीं होंगी
परन्तु इस पर कोई पूछे
जीवन क्या है ?
अक्सर निः-उत्तर हों जातें हैं हम
अक्सर निः-उत्तर हों जातें हैं हम
कुछ शायद गोल-मटोल-सा सा जावाब दे भी दें
पर संतुष्ट न हों पातें हैं हम
आपने पहले भी कई परिभाषाएं सुनी होंगी
कई तर्क संगत उधाहराणों के साथ जुडी होंगी
कोई कहे, जीवन गाड़ी है और समय पहिया
कोई हमे नदी कहे तो कोई कहे पर्वत हमे
आज सहसा एक एहसास हुआ
नींद खुली और ये ही प्रश्न बारम्बार हुआ
जीवन क्या है ???
कहतें हैं जब प्रश्न हो तो उत्तर भी निकल आतें हैं
हम उसी अन्तःमन कि अनुभूति बतातें हैं
जीवन ! सपनों और अपनों का मेल है सारा
दोनों के बीच संतुलन बिठाने का रोचक खेल है हमारा
दुनिया एक मैदान है और हम सब प्रतिभागी
हम हीं दर्शक भी है और हमसे ह़ी प्रतिहारी
असीमित संभावनाएं हैं और असंख्य आपदाएं भी
सपनों को पाना है और अपनों को निभाना भी
जीवन वृक्ष है और हम उसकी शाखाएं
बंधुजन पत्तियां और सपने फल, फ़ूल कि मालाएं
बंधुजनों कि सज्जनता और दुर्जनता, जीवन वास्विकता है
और अपनों के लिए दृष्टिहीन मोह, जीवन कि माया है
जीवन संघर्षपूर्ण है, सपनों को पूरा करने के लिए
जीवन खूबसूरत है, सपनों को पूरा होते देखने के लिए
सबका माली ईश्वर है, वो ही है चेतन और अचेतन में
वह बसता है हमारे मन के शान्तिनिकेतन में
अच्छे-बुरे का भेद किये बिना सबका पालन करता है
देख सब धर्म-अधर्म मौन सदा वो रहता है
वो ही साकार है तो है वो निराकार भी
वो ही हमारा साहस है तो है वो भूचाल भी
जीवन सफ़र है, और बंधुजन हमराही
हरेक पड़ाव हमारे सपनों के सोपान हैं
धर्म ही रास्ता है और ज्ञान ही प्रकाश है
इस समर में बस एक ही अवकाश है
डर और साहस, उम्मीद और निरासा का
गुलाब और काटों सा, एक साथ वास है
बहुत कठिन है ये खेल भाई, कहो कोन यहाँ जीत पाया है
सिकंदर हो या हो कोई गाँधी, सबने यहाँ मात ह़ी खाया है
फिर भी देखो अब मानव आधुनिक से अतिआधुनिक हो आया है
उच्च स्तर पाने हेतु, मानव ही मानव का दुश्मन बना आया है
उच्च स्तर पाने हेतु, मानव ही मानव का दुश्मन बना आया है
अब कहो परमाणू हथियारों का तुम क्या लाभ उठाओगे,
जहाँ भी गिरेगा ये सपनों और अपनों के साथ तुम भी मारे जाओगे