Friday, May 25, 2012

मैं शर्मिंदा हूँ


अब खिसयानी बिल्ली
खम्बा नहीं नोचती,
छोटी कंघी से
निकालती हैं, जूएँ
और एक-एक कर
मारती जाती हैं
सपनों को
वो चाहती है
मुड़वा डाले सर अपना
पर उसका समाज
इसकी इज़ाज़त नहीं देता
नारी योनी में जन्म
उम्मीद और सपनों के
संग होता है
और जन्म के साथ ही
शरू हो जाती है
उम्मीदों का शोषण
स्वपनों की आत्महत्या
मुझे दुःख है,
की मैं भी हिस्सा हूँ
तुम्हारे समाज का
मैं शर्मिंदा हूँ
कि प्रत्यक्ष न सही
पर परोक्ष रूप में ही
मैं भागीदार हूँ
तुम्हारे साथ हो रहे,
अन्यायों और जुल्मो का
आह !
मैं कितना अभागा हूँ
कि मैं एक स्त्री नहीं हूँ

Sunday, May 6, 2012

आप नहीं मानोगे... न ?

आप नहीं मानोगे... न ?

अगर मैं कहूं,
मैं पागल हूँ... तो आप नहीं मानोगे ना ?

अगर मैं कहूं...
मैं चलता नहीं,
धरती ही घिसक रही है मेरे पैरों तले
वक़्त कहाँ गुज़रता है,
मैं गुज़रा करता हूँ, वक़्त की राहों से

मुझ पे नहीं लागू होते प्रकृति के नियम
और नही मानता मैं किसी समाज
और उसकी संरचना को
धार्मिक पुस्तकों और उसके उपदेशों को
तो आप मुझे पागल तो नहीं मानोगे ना ?

 



अगर मैं कहूं...
मैंने देखा है इस धरती को,
जब ये धधक रही थी
तब पूरी तरह तरल थी,
बिलकुल गर्भाशय के द्रव्य के समान
मैंने देखा फिर उन बर्फीले हवाओं का युग भी
और देखा जीवन की उत्पत्ति की सबसे छोटी कहानी भी
तो आप मुझे पागल तो नहीं मानोगे ना ?
अगर मैं कहूँ,
मैंने देखा है जीवन का विकास और प्रकृति के विनाश की लीला
मैं सनातन हूँ, अमीबा से होंसेपियंस तक और तब से अब तलक
देखता आया हूँ, खुद की सुरक्षा के लिए संगठित होते मानव समूहों को
और फिर देखा, मानवों का मानवों को गुलाम बनाते भी
असंख्य हों चुकी उन युद्धों का भी द्रष्टा रहा हूँ,
जो मानवों ने लड़ी ख़ुद अपने ही खिलाफ, बेवजह
और हर बार मानव हारता आया है ख़ुद से,
तो आप मुझे पागल तो नहीं मानोगे ना..?

अगर मैं कहूँ,
मानव और जानवरों में सिर्फ एक अंतर है
की जानवर कुंठित नहीं होते...
तो आप मुझे पागल कह लो, पर मानव नहीं मानोगे न..?

{सनातन भारत}