आप नहीं मानोगे... न ?
अगर मैं कहूं,
मैं पागल हूँ... तो आप नहीं मानोगे ना ?
अगर मैं कहूं...
मैं चलता नहीं,
धरती ही घिसक रही है मेरे पैरों तले
वक़्त कहाँ गुज़रता है,
मैं गुज़रा करता हूँ, वक़्त की राहों से
मुझ पे नहीं लागू होते प्रकृति के नियम
और नही मानता मैं किसी समाज
और उसकी संरचना को
धार्मिक पुस्तकों और उसके उपदेशों को
तो आप मुझे पागल तो नहीं मानोगे ना ?
अगर मैं कहूं...
मैंने देखा है इस धरती को,
जब ये धधक रही थी
तब पूरी तरह तरल थी,
बिलकुल गर्भाशय के द्रव्य के समान
मैंने देखा फिर उन बर्फीले हवाओं का युग भी
और देखा जीवन की उत्पत्ति की सबसे छोटी कहानी भी
तो आप मुझे पागल तो नहीं मानोगे ना ?
अगर मैं कहूँ,
मैंने देखा है जीवन का विकास और प्रकृति के विनाश की लीला
मैं सनातन हूँ, अमीबा से होंसेपियंस तक और तब से अब तलक
देखता आया हूँ, खुद की सुरक्षा के लिए संगठित होते मानव समूहों को
और फिर देखा, मानवों का मानवों को गुलाम बनाते भी
असंख्य हों चुकी उन युद्धों का भी द्रष्टा रहा हूँ,
जो मानवों ने लड़ी ख़ुद अपने ही खिलाफ, बेवजह
और हर बार मानव हारता आया है ख़ुद से,
तो आप मुझे पागल तो नहीं मानोगे ना..?
अगर मैं कहूँ,
मानव और जानवरों में सिर्फ एक अंतर है
की जानवर कुंठित नहीं होते...
तो आप मुझे पागल कह लो, पर मानव नहीं मानोगे न..?
{सनातन भारत}