Friday, May 25, 2012

मैं शर्मिंदा हूँ


अब खिसयानी बिल्ली
खम्बा नहीं नोचती,
छोटी कंघी से
निकालती हैं, जूएँ
और एक-एक कर
मारती जाती हैं
सपनों को
वो चाहती है
मुड़वा डाले सर अपना
पर उसका समाज
इसकी इज़ाज़त नहीं देता
नारी योनी में जन्म
उम्मीद और सपनों के
संग होता है
और जन्म के साथ ही
शरू हो जाती है
उम्मीदों का शोषण
स्वपनों की आत्महत्या
मुझे दुःख है,
की मैं भी हिस्सा हूँ
तुम्हारे समाज का
मैं शर्मिंदा हूँ
कि प्रत्यक्ष न सही
पर परोक्ष रूप में ही
मैं भागीदार हूँ
तुम्हारे साथ हो रहे,
अन्यायों और जुल्मो का
आह !
मैं कितना अभागा हूँ
कि मैं एक स्त्री नहीं हूँ

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