Saturday, December 10, 2011

उदासी

आज मन कुछ उदास-सा है
सुबह से ही
घना कुहासा था चहुँ ओर

कल-तक जो सूरज की किरणें
मेरे मकान के छत के सुराखों से
सीधा मेरे सिरहाने तक आती थी
आज जैस कैद थी
एक सफ़ेद से चादर में

कल तक अपने चमक पर
गर्व करने वाला सूर्य
आज मुझे असहाय दिखा
वो अपनी पूरी ताक़त झोंक रहा था
पर शायद आज दुश्मन भारी है

मगर उम्मीद की किरण, अब भी बांकी है
अब तक हरा नहीं है वो
अभी लड़ रहा है
जीत सुनिश्चित हो या न हो
मगर पराजय स्वीकार नहीं उसको

बस वक़्त की सुई चल रही है
पर वक़्त पर अधिकार नहीं उसका
वक़्त गतिमान है,
पर आज उसकी गति मंद प्रतीत हो रही है
कल तक तो इस वक़्त की पहचान भी सूर्य से थीं
पर आज ये अकेला ही निकल रहा है

वक़्त निकल रहा है और शाम ढल रही है
अँधेरा गहरा रहा है,
मगर गगन के पंछी अभी तक नहीं दिखे हैं
लगता है, आज सफ़र पे निकले ही नहीं
शायद उनका भी सवेरा नहीं हुआ

कोई बात नहीं
आज थोडा जल्दी सो जातें हैं हम
शायद कल सवेरा हो,
सूरज की किरने मेरे सिहराने तक आये
और दूर ये उदासी का अँधेरा हो :-)

-- रणधीर

भ्रम



रोज़ सुबह

एक भ्रम का उदय होता है

मेरे अन्दर

ये भ्रम

कभी मेरा विश्वास होता है

तो कभी स्वपन

कभी ये परिभाषित होता है

तो कभी अपरिभाषित भी

जो बना रहता है

अगली सुबह तक

फिर से

एक नए भ्रम का उदय होने तक...

____________________

-- रणधीर

चाय की दुकान



...आज फिर उस नुक्कड़ से गुज़रा जहाँ से

स्कूल जाते वक़्त, अक्सर गुज़रा करता था

...वहां एक चाय की दुकान हुआ करती थी

बड़े-से क्षेत्रफल में, एक झोपड़ी-सी

...या कहो चार खम्बो पर लेटा सिर्फ एक छत ही

और छत भी न जाने कितनी चीजों से बना था

... वहां फूस भी थे और झाड़ियाँ भी,

स्टील की जंग लगी GI-शीट भी थी और टूटी Asbestos भी

जिसके नीचे का दृश्य भी अनोखा ही था...

एक बड़ी-सी मिट्टी की अंगेठी हुआ करती थी

...जिसमें शोले सा कोयला जल रहा होता था

और नीचे बिना जालीदार ढक्कन की

... चार पंखों वाला एक पुराना सा

cini का पंखा हुआ करता था

मुझे आज भी याद है दो लकड़ी के पुराने बेंच रखे थे, काले से

और दो मिट्टी के चबूतरे बने थे, जिस पे जूट की बोरियां रखीं थी

एक बड़ी सी केतली, काली सी,

जिस पे कई सेंटीमीटर जले दूध और चाय-पत्ती की परतें पड़ी थीं

लगता है, जैसे कभी न धुली हो, और हेंडल भी कुछ ढीले-से

वो केतली मुझ बहुत पसंद आय करती थी,

पर कारण का मुझ अब तक पता नहीं चला

गरमियों में तो उसके दर्शन आराम से हो जातें थे, पर सर्दी में, मुश्किल था

... सर्दी में सभी ग्राहक, चूल्हे को घेरे रहते थे,

वहां मैंने देखा है, लोगों के चेहरों पे मुस्कान

वो किसी बात पे खिलखिला कर हँसना-हँसाना

अनजानों को एक पल में अपना बना ले ना

वो कालोनी से लेकर प्रदेश फिर देश होते हुए

सारी दुनिया के विविध मुद्दों पे बहस करते हुए

कितना जुडाव था वहां, एक मासूमियत-सी थी

वहां की फिजाओं में...

कोयले से निकलती धुएं में एक सोंधी सी खुशबू थी शायद

हर रोज़ बड़े होने का ख्याल भर देती थीं

बड़ा हो कर फिर आया करंगें हम भी यहाँ

फिर हम भी चाय चुस्कियों के साथ

देश दुनिया की बातें किया करेंगें



और देखो आज हम बड़े हो गए,

परन्तु यहाँ सब बदल गया है

चाय की दुकान अब भी है

पर वो संकरी हो गयी है

इसकी छत में वो विविधता नहीं रही

चूल्हे के स्थान पर गैस है और केतली भी छोटी हो गयी है

अब कुल्हर भी तो नहीं, अब रंग बिरंगे कप हैं

अब ना तो वो बेंच ही है और न ही वो मिट्टी के बने चबूतरे ही

अब लोग खड़ें हैं, शायद इसलिए इनका अहम् भी खड़ा है

कोई एक दुसरे से बात नहीं कर रहा,

हां कुछ एक छोटे से समूह से बने हैं जहाँ थोड़ी बहुत भनभनाहट हो रही है

पर कोई मुस्कुरा नहीं रहा,

चाय वाला, अपने आईपॉड से गाने सुनते हुए चाय बना रहा है

तो कुछ लोग चाय पीते हुए गंभीर खड़ें हैं,

शायद कुछ कहना चाहतें हैं, पर उनका अहम् उन्हें रोक रहा है

और अब मैं वहां की फिजाओं में वो गंभीरता ही महसूस कर रहा हूँ

और मैं हतास सा... वहीँ खड़ा ये उम्मीद कर रहा हूँ... शायद वो बचपन फिर लौट आये



-- रणधीर

Saturday, July 16, 2011

जीवन क्या है ?

ये मेरे मन के उद्गार हैं... शायद ये पागलपन लगे... और सच कहें तो हमारा मन तो पागल ही है... ये तो पता नहीं कोई और शक्ति है... जो हमने अपने मन पे काबू पाने में सहायक सिद्ध होती है... पर शायद में उतना खुश नसीब नहीं... ख़ैर जाने दें... पर ये पंक्तियाँ आपतक मेरी बात पहुचाने में सक्षम हुई तो मुझे... संतोष का अनुभव होगा... पर जैसा भी हो आप के टिप्पिनियों का इंतज़ार रहेगा...

शीर्षक : जीवन क्या है ?

जीवन के कई रंग आप ने देखे होंगे
कभी बंधुओं के संग हँसें तो
कभी उनके काँधें पे सर रख रोये होंगें
कभी दिन के चकाचोंध उजाले में भी
रास्ता दिखाने वाले कई होंगें तो
कभी अमावास कि घनघोर अंधेरों में भी
अपनी परछाईयां तक साथ छोर गयीं होंगी
परन्तु इस पर कोई पूछे
जीवन क्या है ?
अक्सर निः-उत्तर हों जातें हैं हम
कुछ शायद गोल-मटोल-सा सा जावाब दे भी दें
पर संतुष्ट न हों पातें हैं हम

आपने पहले भी कई परिभाषाएं सुनी होंगी
कई तर्क संगत उधाहराणों के साथ जुडी होंगी
कोई कहे, जीवन गाड़ी है और समय पहिया
कोई हमे नदी कहे तो कोई कहे पर्वत हमे

आज सहसा एक एहसास हुआ
नींद खुली और ये ही प्रश्न बारम्बार हुआ
जीवन क्या है ???

कहतें हैं जब प्रश्न हो तो उत्तर भी निकल आतें हैं
हम उसी अन्तःमन कि अनुभूति बतातें हैं

जीवन ! सपनों और अपनों का मेल है सारा
दोनों के बीच संतुलन बिठाने का रोचक खेल है हमारा
दुनिया एक मैदान है और हम सब प्रतिभागी
हम हीं दर्शक भी है और हमसे ह़ी प्रतिहारी
असीमित संभावनाएं हैं और असंख्य आपदाएं भी
सपनों को पाना है और अपनों को निभाना भी

जीवन वृक्ष है और हम उसकी शाखाएं
बंधुजन पत्तियां और सपने फल, फ़ूल कि मालाएं
बंधुजनों कि सज्जनता और दुर्जनता, जीवन वास्विकता है
और अपनों के लिए दृष्टिहीन मोह, जीवन कि माया है
जीवन संघर्षपूर्ण है, सपनों को पूरा करने के लिए
जीवन खूबसूरत है, सपनों को पूरा होते देखने के लिए

सबका माली ईश्वर है, वो ही है चेतन और अचेतन में
वह बसता है हमारे मन के शान्तिनिकेतन में
अच्छे-बुरे का भेद किये बिना सबका पालन करता है
देख सब धर्म-अधर्म मौन सदा वो रहता है
वो ही साकार है तो है वो निराकार भी
वो ही हमारा साहस है तो है वो भूचाल भी

जीवन सफ़र है, और बंधुजन हमराही
हरेक पड़ाव हमारे सपनों के सोपान हैं
धर्म ही रास्ता है और ज्ञान ही प्रकाश है
इस समर में बस एक ही अवकाश है
डर और साहस, उम्मीद और निरासा का
गुलाब और काटों सा, एक साथ वास है


बहुत कठिन है ये खेल भाई, कहो कोन यहाँ जीत पाया है
सिकंदर हो या हो कोई गाँधी, सबने यहाँ मात ह़ी खाया है

फिर भी देखो अब मानव आधुनिक से अतिआधुनिक हो आया है
उच्च स्तर पाने हेतु, मानव ही मानव का दुश्मन बना आया है

अब कहो परमाणू हथियारों का तुम क्या लाभ उठाओगे,
जहाँ भी गिरेगा ये सपनों और अपनों के साथ तुम भी मारे जाओगे








Thursday, June 9, 2011

स्वार्थ कि अभिलाषा में

जब मानसिक संकीर्णता के आवेश में
सुसुप्त विकृतियाँ हम पर हावी हों जातीं हैं
अपनी शोषित महत्वाकांक्षाओं के मोह पाश में
हमसे कोई पतितता हो जाती है।

Friday, May 27, 2011


मैंने पहली बार... कुछ इस तरह कि चीज लिखने कि कोशिश कि है... जिसे हम प्राथर्ना कहतें हैं !!
उम्मीद है ... आपको पसंद आये . . .


!!! प्राथर्ना !!!


तू बल दे माँ

कि कर सकूं हर मुश्किल आसं माँ

हर भवंर से नैया लाऊं, निकाल

कभी न छोडूँ, जीने कि आस माँ



तू स्नेह दे माँ

कि दुश्मनों से भी कर सकूं प्यार माँ

नफरतों के बीच भी प्रेम का दीप जले

कभी न हो ईर्ष्या और द्वेष का
भाव माँ

. . . . . . .
. . . . . . .
. . . . . . .

. . . . . . . रणधीर चौधरी . . .

इसके आगे भी लिखूंगा... परन्तु, पहले आप सब कि राय जाना चाह रहा था ... कि प्राथर्ना जैसी हुई भी है या नहीं ?

Thursday, April 14, 2011

मेरी हालत कुछ ऐसी है
मछली जल बिन जैसी है
आँखें हैं पर नींद कहाँ ?
सुर-ताल हैं पर संगीत कहाँ ?

वो रेंत का आशियाना !

वो मेरा बचपन, वो मेरा बांकपन,
वो दादी की कहानियों की राजा-रानी,
वो बेफिक्री, वो मासूमियत,
वो माँ की गोद और बाबा के कंधे

वो आमियाँ के बगीचे, वो पडोसी के बैर
बहनों से लड़ाई, वो इमली की खटाई
वो घोड़ों पे चढ़ाना, भेंसों को नहलाना
वो ऊँचे शिक पे रखे पेड़ों को चुरा के खाना

वो दिन भर की शरारतें, और जोरों का रोना
माटी मैं लोटना, फिर माँ का आँचल से आंसू पोछना
वो दोड़ते हुए गिरना, पीर उठकर फिर दोड़ना
वो बार-बार मक्खन के मटके फोड़ना

वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी
वो प्लास्टिक की गुडिया, वो मिट्टी के खिलोने
कैसें भूलाएँ वो लम्हें इस दिल से,
कैसे करें हम फिर वही कामना
वो रेंत का आशियाँ, वो कबड्डी का गाना
कसम खुदा की, क्या था वो जमाना !