आज मन कुछ उदास-सा है
सुबह से ही
घना कुहासा था चहुँ ओर
कल-तक जो सूरज की किरणें
मेरे मकान के छत के सुराखों से
सीधा मेरे सिरहाने तक आती थी
आज जैस कैद थी
एक सफ़ेद से चादर में
कल तक अपने चमक पर
गर्व करने वाला सूर्य
आज मुझे असहाय दिखा
वो अपनी पूरी ताक़त झोंक रहा था
पर शायद आज दुश्मन भारी है
मगर उम्मीद की किरण, अब भी बांकी है
अब तक हरा नहीं है वो
अभी लड़ रहा है
जीत सुनिश्चित हो या न हो
मगर पराजय स्वीकार नहीं उसको
बस वक़्त की सुई चल रही है
पर वक़्त पर अधिकार नहीं उसका
वक़्त गतिमान है,
पर आज उसकी गति मंद प्रतीत हो रही है
कल तक तो इस वक़्त की पहचान भी सूर्य से थीं
पर आज ये अकेला ही निकल रहा है
वक़्त निकल रहा है और शाम ढल रही है
अँधेरा गहरा रहा है,
मगर गगन के पंछी अभी तक नहीं दिखे हैं
लगता है, आज सफ़र पे निकले ही नहीं
शायद उनका भी सवेरा नहीं हुआ
कोई बात नहीं
आज थोडा जल्दी सो जातें हैं हम
शायद कल सवेरा हो,
सूरज की किरने मेरे सिहराने तक आये
और दूर ये उदासी का अँधेरा हो :-)
-- रणधीर
सुबह से ही
घना कुहासा था चहुँ ओर
कल-तक जो सूरज की किरणें
मेरे मकान के छत के सुराखों से
सीधा मेरे सिरहाने तक आती थी
आज जैस कैद थी
एक सफ़ेद से चादर में
कल तक अपने चमक पर
गर्व करने वाला सूर्य
आज मुझे असहाय दिखा
वो अपनी पूरी ताक़त झोंक रहा था
पर शायद आज दुश्मन भारी है
मगर उम्मीद की किरण, अब भी बांकी है
अब तक हरा नहीं है वो
अभी लड़ रहा है
जीत सुनिश्चित हो या न हो
मगर पराजय स्वीकार नहीं उसको
बस वक़्त की सुई चल रही है
पर वक़्त पर अधिकार नहीं उसका
वक़्त गतिमान है,
पर आज उसकी गति मंद प्रतीत हो रही है
कल तक तो इस वक़्त की पहचान भी सूर्य से थीं
पर आज ये अकेला ही निकल रहा है
वक़्त निकल रहा है और शाम ढल रही है
अँधेरा गहरा रहा है,
मगर गगन के पंछी अभी तक नहीं दिखे हैं
लगता है, आज सफ़र पे निकले ही नहीं
शायद उनका भी सवेरा नहीं हुआ
कोई बात नहीं
आज थोडा जल्दी सो जातें हैं हम
शायद कल सवेरा हो,
सूरज की किरने मेरे सिहराने तक आये
और दूर ये उदासी का अँधेरा हो :-)
-- रणधीर
