Saturday, December 10, 2011

चाय की दुकान



...आज फिर उस नुक्कड़ से गुज़रा जहाँ से

स्कूल जाते वक़्त, अक्सर गुज़रा करता था

...वहां एक चाय की दुकान हुआ करती थी

बड़े-से क्षेत्रफल में, एक झोपड़ी-सी

...या कहो चार खम्बो पर लेटा सिर्फ एक छत ही

और छत भी न जाने कितनी चीजों से बना था

... वहां फूस भी थे और झाड़ियाँ भी,

स्टील की जंग लगी GI-शीट भी थी और टूटी Asbestos भी

जिसके नीचे का दृश्य भी अनोखा ही था...

एक बड़ी-सी मिट्टी की अंगेठी हुआ करती थी

...जिसमें शोले सा कोयला जल रहा होता था

और नीचे बिना जालीदार ढक्कन की

... चार पंखों वाला एक पुराना सा

cini का पंखा हुआ करता था

मुझे आज भी याद है दो लकड़ी के पुराने बेंच रखे थे, काले से

और दो मिट्टी के चबूतरे बने थे, जिस पे जूट की बोरियां रखीं थी

एक बड़ी सी केतली, काली सी,

जिस पे कई सेंटीमीटर जले दूध और चाय-पत्ती की परतें पड़ी थीं

लगता है, जैसे कभी न धुली हो, और हेंडल भी कुछ ढीले-से

वो केतली मुझ बहुत पसंद आय करती थी,

पर कारण का मुझ अब तक पता नहीं चला

गरमियों में तो उसके दर्शन आराम से हो जातें थे, पर सर्दी में, मुश्किल था

... सर्दी में सभी ग्राहक, चूल्हे को घेरे रहते थे,

वहां मैंने देखा है, लोगों के चेहरों पे मुस्कान

वो किसी बात पे खिलखिला कर हँसना-हँसाना

अनजानों को एक पल में अपना बना ले ना

वो कालोनी से लेकर प्रदेश फिर देश होते हुए

सारी दुनिया के विविध मुद्दों पे बहस करते हुए

कितना जुडाव था वहां, एक मासूमियत-सी थी

वहां की फिजाओं में...

कोयले से निकलती धुएं में एक सोंधी सी खुशबू थी शायद

हर रोज़ बड़े होने का ख्याल भर देती थीं

बड़ा हो कर फिर आया करंगें हम भी यहाँ

फिर हम भी चाय चुस्कियों के साथ

देश दुनिया की बातें किया करेंगें



और देखो आज हम बड़े हो गए,

परन्तु यहाँ सब बदल गया है

चाय की दुकान अब भी है

पर वो संकरी हो गयी है

इसकी छत में वो विविधता नहीं रही

चूल्हे के स्थान पर गैस है और केतली भी छोटी हो गयी है

अब कुल्हर भी तो नहीं, अब रंग बिरंगे कप हैं

अब ना तो वो बेंच ही है और न ही वो मिट्टी के बने चबूतरे ही

अब लोग खड़ें हैं, शायद इसलिए इनका अहम् भी खड़ा है

कोई एक दुसरे से बात नहीं कर रहा,

हां कुछ एक छोटे से समूह से बने हैं जहाँ थोड़ी बहुत भनभनाहट हो रही है

पर कोई मुस्कुरा नहीं रहा,

चाय वाला, अपने आईपॉड से गाने सुनते हुए चाय बना रहा है

तो कुछ लोग चाय पीते हुए गंभीर खड़ें हैं,

शायद कुछ कहना चाहतें हैं, पर उनका अहम् उन्हें रोक रहा है

और अब मैं वहां की फिजाओं में वो गंभीरता ही महसूस कर रहा हूँ

और मैं हतास सा... वहीँ खड़ा ये उम्मीद कर रहा हूँ... शायद वो बचपन फिर लौट आये



-- रणधीर

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