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जन्म से चंचल
तीव्र बहने वाली
पहाड़ी नदियाँ...
पर्वतों को तोड़ती,
अपने संग पत्थरों को
गिराती,
घसीटती...
ले आती है मैदानों में
और बिछा देती है
एक उपजाऊ जमीन
मानवों के दोहन से
बंजर हो चुकी खेतों पर
जहाँ लहलहा उठते हैं,
असंख्य जीवन...
धरातल की शान्ति
पहुँच चुकी होती है
सतह तक...
मोहवश अब
बोझिल हो उठती हैं
नदियाँ,
तब बाँट देती है
उसकी निर्मित धरती
उसे कई धाराओं में,
होता है निर्माण
डेल्टा का
जहाँ की नमी
कभी कम नहीं होती
जहाँ उग आते हैं
कई सुन्दर वन
जहाँ सूर्य की किरण
नहीं पहुँच पाती
जमीन तक
जहाँ दफ़न कर दी जाती है
नदी
सागर में मिलने से पहले ही...
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{रणधीर}