Tuesday, June 26, 2012

सबको अपना कहने का सुकून, भरभरा जाता है
जब अपना सपना मनी-मनी, कोई तोड़ जाता है
मनोरंजन के लिए सिर्फ ही नहीं उतारे जाते कपडे
इन्ही से किसी के कुककर्मो को छिपाया जाता है

Saturday, June 23, 2012

आपस में प्रेम करो देश प्रेमियों

आपस में प्रेम करो देश प्रेमियों
♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥

सच कहती है... वो
बादलों के घिरने का उन्माद
उसके बूँद बन बरसने से ज्यादा
उतेज्जना भरा होता है...
वो यह भी कहती है...
दुनिया में सबसे ज्यादा मज़ा
लोगों द्वारा घोषित
सबसे निष्कृत कार्य करने में है...
मैं भी मानता हूँ
क्रांति नियमों के पालन से नहीं
वरण नमक बनाने से आती है
देश का भविष्य
स्कूल-कॉलेजों में उपस्थिति से नहीं
बल्कि एकता की हुंकार लिए
सड़कों पर,
रोड़ों को ठोकर मारते हुए
शहीद होने में है

प्रेम संकुचन है
दायरों का
विचारों का
तो प्रेम एक उड़ान भी है
सपनो का
विचारों का
प्रेम नहीं तोड़ पता
रेशम का पतला तागा भी
तो भर देता है
जूनून और होसला भी

देश का भला प्रेम में ही है
आपस में प्रेम करो
देश से प्रेम करो
नफरत
धोखा और बदले भड़काती है
और प्रेम
त्याग और खुशियाँ फैलाती है

♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
{रणधीर भारत }

!! सावधान समय सावधान !!

!! सावधान समय सावधान !!
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सुन समय...
मैंने हर बार कोशिश की है
तुमसे दोस्ती करने की
और तू है की
attitude दिखाता रहा है
मैंने जब भी कहा
तेज़ चलने को
तू थम गया
और जब तुझे घसीटते-घसीटते
मैं थक गया
तू उठकर
सरपट दौड़ गया
फिर भी
मैंने तुझे माफ़ किया
तुने भी रंग बदल लिए
मगर रंगत नहीं बदली

सच ही कहतें थे,
कुओं को छोड़ कर जाते मेढ़क
तू किसी का साथी हो ही नहीं सकता
झूठ कहतें हैं लोग...
इंतज़ार करने से प्यार बढ़ता है
वरण
खीझ बढती है,
और बढ़ता है, तनाव
और सुन समय
तुने तो कभी इंतजार नहीं किया

देख, मैं जनता हूँ
तू वापस नहीं जा सकता
तो साथ चला कर
वरना मुझमें भी ताक़त है
तेरा भविष्य बदलने की
सावधान समय सावधान
ये याचना नहीं चेतावनी है...
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[रणधीर भारत]

Sunday, June 10, 2012

तुम नदी सी हो ("माँ")


♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
जन्म से चंचल
तीव्र बहने वाली
पहाड़ी नदियाँ...
पर्वतों को तोड़ती,
अपने संग पत्थरों को
गिराती,
घसीटती...
ले आती है मैदानों में
और बिछा देती है
एक उपजाऊ जमीन
मानवों के दोहन से
बंजर हो चुकी खेतों पर
जहाँ लहलहा उठते हैं,
असंख्य जीवन...

धरातल की शान्ति
पहुँच चुकी होती है
सतह तक...
मोहवश अब
बोझिल हो उठती हैं
नदियाँ,
तब बाँट देती है
उसकी निर्मित धरती
उसे कई धाराओं में,
होता है निर्माण
डेल्टा का

जहाँ की नमी
कभी कम नहीं होती
जहाँ उग आते हैं
कई सुन्दर वन
जहाँ सूर्य की किरण
नहीं पहुँच पाती
जमीन तक
जहाँ दफ़न कर दी जाती है
नदी
सागर में मिलने से पहले ही...
♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
{रणधीर}

Friday, May 25, 2012

मैं शर्मिंदा हूँ


अब खिसयानी बिल्ली
खम्बा नहीं नोचती,
छोटी कंघी से
निकालती हैं, जूएँ
और एक-एक कर
मारती जाती हैं
सपनों को
वो चाहती है
मुड़वा डाले सर अपना
पर उसका समाज
इसकी इज़ाज़त नहीं देता
नारी योनी में जन्म
उम्मीद और सपनों के
संग होता है
और जन्म के साथ ही
शरू हो जाती है
उम्मीदों का शोषण
स्वपनों की आत्महत्या
मुझे दुःख है,
की मैं भी हिस्सा हूँ
तुम्हारे समाज का
मैं शर्मिंदा हूँ
कि प्रत्यक्ष न सही
पर परोक्ष रूप में ही
मैं भागीदार हूँ
तुम्हारे साथ हो रहे,
अन्यायों और जुल्मो का
आह !
मैं कितना अभागा हूँ
कि मैं एक स्त्री नहीं हूँ

Sunday, May 6, 2012

आप नहीं मानोगे... न ?

आप नहीं मानोगे... न ?

अगर मैं कहूं,
मैं पागल हूँ... तो आप नहीं मानोगे ना ?

अगर मैं कहूं...
मैं चलता नहीं,
धरती ही घिसक रही है मेरे पैरों तले
वक़्त कहाँ गुज़रता है,
मैं गुज़रा करता हूँ, वक़्त की राहों से

मुझ पे नहीं लागू होते प्रकृति के नियम
और नही मानता मैं किसी समाज
और उसकी संरचना को
धार्मिक पुस्तकों और उसके उपदेशों को
तो आप मुझे पागल तो नहीं मानोगे ना ?

 



अगर मैं कहूं...
मैंने देखा है इस धरती को,
जब ये धधक रही थी
तब पूरी तरह तरल थी,
बिलकुल गर्भाशय के द्रव्य के समान
मैंने देखा फिर उन बर्फीले हवाओं का युग भी
और देखा जीवन की उत्पत्ति की सबसे छोटी कहानी भी
तो आप मुझे पागल तो नहीं मानोगे ना ?
अगर मैं कहूँ,
मैंने देखा है जीवन का विकास और प्रकृति के विनाश की लीला
मैं सनातन हूँ, अमीबा से होंसेपियंस तक और तब से अब तलक
देखता आया हूँ, खुद की सुरक्षा के लिए संगठित होते मानव समूहों को
और फिर देखा, मानवों का मानवों को गुलाम बनाते भी
असंख्य हों चुकी उन युद्धों का भी द्रष्टा रहा हूँ,
जो मानवों ने लड़ी ख़ुद अपने ही खिलाफ, बेवजह
और हर बार मानव हारता आया है ख़ुद से,
तो आप मुझे पागल तो नहीं मानोगे ना..?

अगर मैं कहूँ,
मानव और जानवरों में सिर्फ एक अंतर है
की जानवर कुंठित नहीं होते...
तो आप मुझे पागल कह लो, पर मानव नहीं मानोगे न..?

{सनातन भारत}

Saturday, December 10, 2011

उदासी

आज मन कुछ उदास-सा है
सुबह से ही
घना कुहासा था चहुँ ओर

कल-तक जो सूरज की किरणें
मेरे मकान के छत के सुराखों से
सीधा मेरे सिरहाने तक आती थी
आज जैस कैद थी
एक सफ़ेद से चादर में

कल तक अपने चमक पर
गर्व करने वाला सूर्य
आज मुझे असहाय दिखा
वो अपनी पूरी ताक़त झोंक रहा था
पर शायद आज दुश्मन भारी है

मगर उम्मीद की किरण, अब भी बांकी है
अब तक हरा नहीं है वो
अभी लड़ रहा है
जीत सुनिश्चित हो या न हो
मगर पराजय स्वीकार नहीं उसको

बस वक़्त की सुई चल रही है
पर वक़्त पर अधिकार नहीं उसका
वक़्त गतिमान है,
पर आज उसकी गति मंद प्रतीत हो रही है
कल तक तो इस वक़्त की पहचान भी सूर्य से थीं
पर आज ये अकेला ही निकल रहा है

वक़्त निकल रहा है और शाम ढल रही है
अँधेरा गहरा रहा है,
मगर गगन के पंछी अभी तक नहीं दिखे हैं
लगता है, आज सफ़र पे निकले ही नहीं
शायद उनका भी सवेरा नहीं हुआ

कोई बात नहीं
आज थोडा जल्दी सो जातें हैं हम
शायद कल सवेरा हो,
सूरज की किरने मेरे सिहराने तक आये
और दूर ये उदासी का अँधेरा हो :-)

-- रणधीर