Saturday, July 7, 2012

सुबह-सुबह जब आँखें खुलती-बंद होती रही...
तो चल पड़ा था एक कारवां... पीछे की और
ध्वनि की गति से, बढ़ने लगा था समय...
जहाँ मैं, बुन रहा था जालें... स्वयम के लिए
छिपकलियाँ फेर रही थी अपनी लम्बी जुबान
तिलचट्टों ने भी आमंत्रित कर रखा था, अपने बंधू-बांधवों को
मकड़े सुस्त पड़ गये, छोड़ रखा था जालों का निर्माण कार्य
चूहों ने बना रखी है प्रवास की यौजनाएं
ओह! हे ईश्वर, ये मेरे साथी हैं,
जिनके साथ बिताये हैं मैंने, जीवन का हर क्षण हर पल
सोच की शक्ति ने पकड़ रखी है वक़्त की नब्ज
और मुझे भयभीत कर रही है, इसकी छटफटाहट
इधर चमगादड़ों ने भी... पूरी तैयारी कर रखी है... मेरे घर पे कब्जा ज़माने की
मैं फंसा हूँ, स्वयम के निर्मित... जालों में
वक़्त की नब्ज छोड़ दी है मैंने... वो अब आगे बढ़ रहा है...
पर इतंजार अभी खत्म नहीं हुआ... हम अभी जिन्दा हैं मेरे दोस्त
- रणधीर (uncover)
हा हा :-) :-) :-)
हाँ माँ !
मैं जनता हूँ... मैं प्रिय हूँ तुम्हारा 
और मेरी भी तो तुम प्रिय हो... 
मैं देखा है हर बार तुम्हें... मेरे दर्द पर फुट पड़ते हुये 
पर हर बार में भी फूट पड़ता था माँ, 
जब स्कूल जाते वक़्त मेरे साथ मेरी बहने नहीं होती थी
और उस वक़्त भी, जब तुमने मुझे... बहनो से छिपा कर पेडे दिये थे 
माँ, अपनी गलतियों पर भी बहनों को मार पड़ने पर में यूंही नहीं रोता था 
माँ मुझे तब भी अच्छ नहीं लगता था, 
जब मेरी बहने... मेरे छोटे हो चुके कपड़े पहनती थी...
और माँ तब तो सुबक-सुबक के कई मर जाता था... 
सर्दी में बहनो की चादर तुम मुझ पर डाल जाती थी 
माँ अब आगे नहीं कह पाऊँगा... रुँध गया है गला मेरा... 

{भारत} [आज भाई नहीं हूँ, बेटा हूँ]

Tuesday, June 26, 2012

दोस्तों में छुपे बैठे थे कई दुश्मन हमारे,
पका रह थे खिचिड़ी, अति गाढ़े वाले...
खुदा करता है, सब के कर्मों का इन्साफ
आज खुद फंसे हैं, मेरे लिए जाल बुनने वाले...
सबको अपना कहने का सुकून, भरभरा जाता है
जब अपना सपना मनी-मनी, कोई तोड़ जाता है
मनोरंजन के लिए सिर्फ ही नहीं उतारे जाते कपडे
इन्ही से किसी के कुककर्मो को छिपाया जाता है

Saturday, June 23, 2012

आपस में प्रेम करो देश प्रेमियों

आपस में प्रेम करो देश प्रेमियों
♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥

सच कहती है... वो
बादलों के घिरने का उन्माद
उसके बूँद बन बरसने से ज्यादा
उतेज्जना भरा होता है...
वो यह भी कहती है...
दुनिया में सबसे ज्यादा मज़ा
लोगों द्वारा घोषित
सबसे निष्कृत कार्य करने में है...
मैं भी मानता हूँ
क्रांति नियमों के पालन से नहीं
वरण नमक बनाने से आती है
देश का भविष्य
स्कूल-कॉलेजों में उपस्थिति से नहीं
बल्कि एकता की हुंकार लिए
सड़कों पर,
रोड़ों को ठोकर मारते हुए
शहीद होने में है

प्रेम संकुचन है
दायरों का
विचारों का
तो प्रेम एक उड़ान भी है
सपनो का
विचारों का
प्रेम नहीं तोड़ पता
रेशम का पतला तागा भी
तो भर देता है
जूनून और होसला भी

देश का भला प्रेम में ही है
आपस में प्रेम करो
देश से प्रेम करो
नफरत
धोखा और बदले भड़काती है
और प्रेम
त्याग और खुशियाँ फैलाती है

♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
{रणधीर भारत }

!! सावधान समय सावधान !!

!! सावधान समय सावधान !!
******************************

सुन समय...
मैंने हर बार कोशिश की है
तुमसे दोस्ती करने की
और तू है की
attitude दिखाता रहा है
मैंने जब भी कहा
तेज़ चलने को
तू थम गया
और जब तुझे घसीटते-घसीटते
मैं थक गया
तू उठकर
सरपट दौड़ गया
फिर भी
मैंने तुझे माफ़ किया
तुने भी रंग बदल लिए
मगर रंगत नहीं बदली

सच ही कहतें थे,
कुओं को छोड़ कर जाते मेढ़क
तू किसी का साथी हो ही नहीं सकता
झूठ कहतें हैं लोग...
इंतज़ार करने से प्यार बढ़ता है
वरण
खीझ बढती है,
और बढ़ता है, तनाव
और सुन समय
तुने तो कभी इंतजार नहीं किया

देख, मैं जनता हूँ
तू वापस नहीं जा सकता
तो साथ चला कर
वरना मुझमें भी ताक़त है
तेरा भविष्य बदलने की
सावधान समय सावधान
ये याचना नहीं चेतावनी है...
************************************
[रणधीर भारत]

Sunday, June 10, 2012

तुम नदी सी हो ("माँ")


♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
जन्म से चंचल
तीव्र बहने वाली
पहाड़ी नदियाँ...
पर्वतों को तोड़ती,
अपने संग पत्थरों को
गिराती,
घसीटती...
ले आती है मैदानों में
और बिछा देती है
एक उपजाऊ जमीन
मानवों के दोहन से
बंजर हो चुकी खेतों पर
जहाँ लहलहा उठते हैं,
असंख्य जीवन...

धरातल की शान्ति
पहुँच चुकी होती है
सतह तक...
मोहवश अब
बोझिल हो उठती हैं
नदियाँ,
तब बाँट देती है
उसकी निर्मित धरती
उसे कई धाराओं में,
होता है निर्माण
डेल्टा का

जहाँ की नमी
कभी कम नहीं होती
जहाँ उग आते हैं
कई सुन्दर वन
जहाँ सूर्य की किरण
नहीं पहुँच पाती
जमीन तक
जहाँ दफ़न कर दी जाती है
नदी
सागर में मिलने से पहले ही...
♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
{रणधीर}

Friday, May 25, 2012

मैं शर्मिंदा हूँ


अब खिसयानी बिल्ली
खम्बा नहीं नोचती,
छोटी कंघी से
निकालती हैं, जूएँ
और एक-एक कर
मारती जाती हैं
सपनों को
वो चाहती है
मुड़वा डाले सर अपना
पर उसका समाज
इसकी इज़ाज़त नहीं देता
नारी योनी में जन्म
उम्मीद और सपनों के
संग होता है
और जन्म के साथ ही
शरू हो जाती है
उम्मीदों का शोषण
स्वपनों की आत्महत्या
मुझे दुःख है,
की मैं भी हिस्सा हूँ
तुम्हारे समाज का
मैं शर्मिंदा हूँ
कि प्रत्यक्ष न सही
पर परोक्ष रूप में ही
मैं भागीदार हूँ
तुम्हारे साथ हो रहे,
अन्यायों और जुल्मो का
आह !
मैं कितना अभागा हूँ
कि मैं एक स्त्री नहीं हूँ

Sunday, May 6, 2012

आप नहीं मानोगे... न ?

आप नहीं मानोगे... न ?

अगर मैं कहूं,
मैं पागल हूँ... तो आप नहीं मानोगे ना ?

अगर मैं कहूं...
मैं चलता नहीं,
धरती ही घिसक रही है मेरे पैरों तले
वक़्त कहाँ गुज़रता है,
मैं गुज़रा करता हूँ, वक़्त की राहों से

मुझ पे नहीं लागू होते प्रकृति के नियम
और नही मानता मैं किसी समाज
और उसकी संरचना को
धार्मिक पुस्तकों और उसके उपदेशों को
तो आप मुझे पागल तो नहीं मानोगे ना ?

 



अगर मैं कहूं...
मैंने देखा है इस धरती को,
जब ये धधक रही थी
तब पूरी तरह तरल थी,
बिलकुल गर्भाशय के द्रव्य के समान
मैंने देखा फिर उन बर्फीले हवाओं का युग भी
और देखा जीवन की उत्पत्ति की सबसे छोटी कहानी भी
तो आप मुझे पागल तो नहीं मानोगे ना ?
अगर मैं कहूँ,
मैंने देखा है जीवन का विकास और प्रकृति के विनाश की लीला
मैं सनातन हूँ, अमीबा से होंसेपियंस तक और तब से अब तलक
देखता आया हूँ, खुद की सुरक्षा के लिए संगठित होते मानव समूहों को
और फिर देखा, मानवों का मानवों को गुलाम बनाते भी
असंख्य हों चुकी उन युद्धों का भी द्रष्टा रहा हूँ,
जो मानवों ने लड़ी ख़ुद अपने ही खिलाफ, बेवजह
और हर बार मानव हारता आया है ख़ुद से,
तो आप मुझे पागल तो नहीं मानोगे ना..?

अगर मैं कहूँ,
मानव और जानवरों में सिर्फ एक अंतर है
की जानवर कुंठित नहीं होते...
तो आप मुझे पागल कह लो, पर मानव नहीं मानोगे न..?

{सनातन भारत}